कुंवर नारायण

अब मैं एक छोटे-से घर
और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ

कभी मैं एक बहुत बड़े घर
और छोटी-सी दुनिया में रहता था

कम दीवारों से
बड़ा फ़र्क पड़ता है

दीवारें न हों
तो दुनिया से भी बड़ा हो जाता है घर।
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एम्मानुएल ओर्तीज

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।
आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए?
इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूँ
मेरी गुज़ारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें…
उन सब के लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, क़ैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं…
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हबीब पेंटर

मस्जिद ऊपर बांग दे मुल्‍ला
रखकर उंगली कान
घंटा बाजै मंदिर में
कछु बहरो है भगवान

सालों से ढूंढ रही थी ये नायाब चीज़ आज हाथ आई है… हबीब पेंटर से सुनी थी ये कव्वाली बचपन में… अमीर खुसरो की मशहूर चीज़ से शुरुआत कर के देखिए कहाँ ले गए बात… … More हबीब पेंटर

बहादुर शाह ज़फ़र

तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया

न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर
पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा

‘ज़फ़र’ आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का
जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा न रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न रहा
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अकबर इलाहाबादी

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं

मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं
फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं

अक़्ल में जो घिर गया ला-इंतिहा क्यूँकर हुआ
जो समा में आ गया फिर वो ख़ुदा क्यूँकर हुआ
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सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना ।

पेश है कुछ उनका लिखा जो मुझे बहुत पसंद है… … More सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

मीर तक़ी मीर

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या

कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है

पेश है कुछ उनका लिखा जो मुझे बहुत पसंद है… … More मीर तक़ी मीर

मख़दूम मुहिउद्दीन

ऐसे सन्नाटे में इक-आध तो पत्ता खड़के
कोई पिघला हुआ मोती
कोई आँसू
कोई दिल
कुछ भी नहीं
कितनी सुनसान है ये राहगुज़र
कोई रुख़्सार तो चमके कोई बिजली तो गिरे
आगे का यहाँ पढ़ें… … More मख़दूम मुहिउद्दीन

सुरूर बाराबंकवी

मैं जहाँ पर था वहाँ से लौटना मुमकिन न था
और तुम भी आ गए थे पास कुछ दिल के सिवा

उस की महफ़िल आईना-ख़ाना तो थी लेकिन ‘सुरूर’
सारे आईने सलामत थे मिरे दिल के सिवा

पेश है कुछ उनका लिखा जो मुझे बहुत पसंद है… … More सुरूर बाराबंकवी