मजरूह सुल्तानपुरी

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख

बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते

पेश है कुछ उनका लिखा जो मुझे बहुत पसंद है…
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नया साल मुबारक़!

मिर्ज़ा ग़ालिब कह गए थे:
देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़,
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है!

तिस पर अहमद फ़राज़ ने कुछ यूँ जवाब दिया: [जो कि 2020 पर दुरुस्त बैठता है!]
न शब ओ रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है
किस बरहमन ने कहा था कि ये साल अच्छा है !

क़तील शिफ़ाई भी कहाँ चुप रहते! बोले:
जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
उस को दफ़नाओ मिरे हाथ की रेखाओं में

कुछ नए साल के बारे में चुनींदा अशआर! … More नया साल मुबारक़!

मौत – एक बड़ी सच्चाई, एक तल्ख़ हक़ीक़त

मौत से किस को रुस्तगारी है
आज वो कल हमारी बारी है

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

उन तमाम दोस्तों के नाम जिन्हें वक़्त ने बेवक्त छीन लिया हमसे… … More मौत – एक बड़ी सच्चाई, एक तल्ख़ हक़ीक़त

वसीम बरेलवी

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता
तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तिरी क्या
हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता

पेश है कुछ उनका लिखा जो मुझे बहुत पसंद है…

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जॉन एलिया

काम की बात मैं ने की ही नहीं
ये मिरा तौर-ए-ज़िंदगी ही नहीं

मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूँ
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से

कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है
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कुंवर नारायण

अब मैं एक छोटे-से घर
और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ

कभी मैं एक बहुत बड़े घर
और छोटी-सी दुनिया में रहता था

कम दीवारों से
बड़ा फ़र्क पड़ता है

दीवारें न हों
तो दुनिया से भी बड़ा हो जाता है घर।
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एम्मानुएल ओर्तीज

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।
आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए?
इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूँ
मेरी गुज़ारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें…
उन सब के लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, क़ैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं…
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हबीब पेंटर

मस्जिद ऊपर बांग दे मुल्‍ला
रखकर उंगली कान
घंटा बाजै मंदिर में
कछु बहरो है भगवान

सालों से ढूंढ रही थी ये नायाब चीज़ आज हाथ आई है… हबीब पेंटर से सुनी थी ये कव्वाली बचपन में… अमीर खुसरो की मशहूर चीज़ से शुरुआत कर के देखिए कहाँ ले गए बात… … More हबीब पेंटर

बहादुर शाह ज़फ़र

तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया

न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर
पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा

‘ज़फ़र’ आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का
जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा न रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न रहा
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अकबर इलाहाबादी

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं

मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं
फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं

अक़्ल में जो घिर गया ला-इंतिहा क्यूँकर हुआ
जो समा में आ गया फिर वो ख़ुदा क्यूँकर हुआ
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