उर्दू मैंने यूँ सीखी

तो यह कहानी है 1977 की जब मुझ पर कुर्अतुल ऐन हैदर की ‘आग का दरिया’ पढ़ने का भूत सवार हुआ! उर्दू शायरी का शौक बचपन से था और देवनागरी लिपि में लिखा बहुत मिल जाता सो काम चल रहा था।

मगर ‘आग का दरिया’ पूरी मशक़्क़त के बावजूद मुझे देवनागरी में न मिल पाई! [हिंदी अनुवाद मिलता था मगर मैं ऐनी आपा की ज़ुबानी ही सुनना चाहती थी!] बहुत दौड़-धूप की, मगर उर्दू का कोई पार्ट-टाइम या शाम का स्कूल न मिला [डॉक्टरी में दाख़िला मिल चुका था]।

तो बस में रोज़ आते जाते उर्दू-हिन्दी शब्द-कोश चाट डाला!  कुछ अपने उर्दू जानने वाले दोस्तों ने मदद की और आख़िरकार एन.सी.पी.यू.एल [NCPUL – National Council for Promotion of Urdu Language] ने एक ऑनलाइन कोर्स शुरू किया और 2004 में उर्दू डिप्लोमा कर पाई!

ज़ुबान तो ख़ैर जैसे तैसे थोड़ी बहुत सीख ली मगर ‘आग का दरिया’ पल्ले न पड़ी – तब समझ आया कि जब तक लफ़्ज़ों का भंडार लबालब न हो, न अच्छा पढ़ पाऊँगी, न लिख पाऊँगी! यूँ भी पूरी उम्र पढ़ने-पढ़ाने में बीती, और ज़िंदगी को मैंने सदा एक सीखने-सिखाने की कोशिश ही माना!

तो अब कुछ दोस्तों के उकसाने पर थोड़ा बहुत साझा करने का सिलसिला शुरू हुआ है!
इतनी मेहनत और लगन से जो लुगत और उर्दू कोश [थेसोरस] वगैरह बनाए, वो तो सब इंटरनेट की बली चढ़ गए! बाक़ी कुछ जो खुरचन बची है, किसी के काम आ जाए शायद, इसी उम्मीद से अपनी गुमशुदा डाइरियों के पन्नों की ख़ाक फिर से छाननी शुरू की है – देखें वो सब लफ़्ज़ इस पन्ने को कब तक भर पाते हैं!

यूँ भी मीर साहब चेतावनी दे ही गए हैं – इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या! तो इंतिज़ार में हम भी हैं, कुछ शुरुआत नीचे दर्ज है!

  • कलम के कलाम [बहुत सी अपनी लिखी चीज़ें अब भी क़ैद हैं गुमशुदा डाइरियों के पन्नों पर – कुछ को यहाँ हाज़िरी मिल गई है, बाक़ी पहुँचती ही होंगी!]
  • मेरे मनपसंद शायर और कवि [इन्हीं को पढ़ते-सुनते, साथ मुशायरों में वाह-वाही लूटते बड़े हुए – बहुतों ने उर्दू-हिंदी से मुहोब्बत बढ़ाई, कुछ ने साहित्य में डूबने पर मजबूर किया, और सभी ने इतना गहरा असर छोड़ा जिसका रंग आज भी सर चढ़ कर बोलता है!]


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