The Vocabulary of Indian Classical Music

The terms associated with Indian Classical Music can be confusing at times, and familiarity with them helps understand & appreciate music and converse in the same language with fellow aficionados!
Here is a Glossary with some audio-visual links.   … More The Vocabulary of Indian Classical Music

मजरूह सुल्तानपुरी

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख

बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते

पेश है कुछ उनका लिखा जो मुझे बहुत पसंद है…
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नया साल मुबारक़!

मिर्ज़ा ग़ालिब कह गए थे:
देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़,
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है!

तिस पर अहमद फ़राज़ ने कुछ यूँ जवाब दिया: [जो कि 2020 पर दुरुस्त बैठता है!]
न शब ओ रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है
किस बरहमन ने कहा था कि ये साल अच्छा है !

क़तील शिफ़ाई भी कहाँ चुप रहते! बोले:
जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
उस को दफ़नाओ मिरे हाथ की रेखाओं में

कुछ नए साल के बारे में चुनींदा अशआर! … More नया साल मुबारक़!

नव रस (Nav ras)

रस का शाब्दिक अर्थ है – आनन्द। कला में दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही रस कहलाता है। रस के जिस भाव से यह अनुभूति होती है कि वह स्थायी भाव होता है। जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता। केवल रस रहता है। उसकी भावता अपना रूपांतर कर लेती है। रस नौ हैं और भरत मुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ में शृंगार, रौद्र, वीर तथा वीभत्स, इन चार रसों को ही प्रधान माना है … More नव रस (Nav ras)

मौत – एक बड़ी सच्चाई, एक तल्ख़ हक़ीक़त

मौत से किस को रुस्तगारी है
आज वो कल हमारी बारी है

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

उन तमाम दोस्तों के नाम जिन्हें वक़्त ने बेवक्त छीन लिया हमसे… … More मौत – एक बड़ी सच्चाई, एक तल्ख़ हक़ीक़त

वसीम बरेलवी

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता
तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तिरी क्या
हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता

पेश है कुछ उनका लिखा जो मुझे बहुत पसंद है…

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जॉन एलिया

काम की बात मैं ने की ही नहीं
ये मिरा तौर-ए-ज़िंदगी ही नहीं

मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूँ
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से

कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है
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