नया साल मुबारक़!

कुछ ख़ुशियाँ कुछ आँसू दे कर टाल गया
जीवन का इक और सुनहरा साल गया!


मिर्ज़ा ग़ालिब कह गए थे:

देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़,
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है!

तिस पर अहमद फ़राज़ ने कुछ यूँ जवाब दिया: [जो कि 2020 पर दुरुस्त बैठता है!]

न शब ओ रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है
किस बरहमन ने कहा था कि ये साल अच्छा है !

क़तील शिफ़ाई भी कहाँ चुप रहते! बोले:

जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
उस को दफ़नाओ मिरे हाथ की रेखाओं में

इक साल गया इक साल नया है आने को
पर वक़्त का अब भी होश नहीं दीवाने को
इब्न-ए-इंशा

तू नया है तो दिखा सुब्ह नई शाम नई
वर्ना इन आँखों ने देखे हैं नए साल कई
फ़ैज़ लुधियानवी

किसी को साल-ए-नौ की क्या मुबारकबाद दी जाए
कैलन्डर के बदलने से मुक़द्दर कब बदलता है
ऐतबार साजिद

आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर
जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे
अहमद फ़राज़

यकुम जनवरी है नया साल है
दिसम्बर में पूछूँगा क्या हाल है
अमीर क़ज़लबाश

एक पत्ता शजर-ए-उम्र से लो और गिरा
लोग कहते हैं मुबारक हो नया साल तुम्हें

फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग
राख हो जाएगा ये साल भी हैरत कैसी
अज़ीज़ नबील

इक अजनबी के हाथ में दे कर हमारा हाथ
लो साथ छोड़ने लगा आख़िर ये साल भी
हफ़ीज़ मेरठी

पुराने साल की ठिठुरी हुई परछाइयाँ सिमटीं
नए दिन का नया सूरज उफ़ुक़ पर उठता आता है
अली सरदार जाफ़री

चेहरे से झाड़ पिछले बरस की कुदूरतें
दीवार से पुराना कैलन्डर उतार दे
ज़फ़र इक़बाल

उम्र का एक और साल गया
वक़्त फिर हम पे ख़ाक डाल गया
शकील जमाली

नए साल में पिछली नफ़रत भुला दें
अपनी दुनिया को जन्नत बना दें

अब के बार मिल के यूँ साल-ए-नौ मनाएँगे
रंजिशें भुला कर हम नफ़रतें मिटाएँगे

पिछ्ला बरस तो ख़ून रुला कर गुज़र गया
क्या गुल खिलाएगा ये नया साल दोस्तो
फ़ारूक़ इंजीनियर

ऐ जाते बरस तुझ को सौंपा ख़ुदा को
मुबारक मुबारक नया साल सब को
मोहम्मद असदुल्लाह

साल-ए-नौ आता है तो महफ़ूज़ कर लेता हूँ मैं
कुछ पुराने से कैलन्डर ज़ेहन की दीवार पर
आज़ाद गुलाटी

मुंहदिम होता चला जाता है दिल साल-ब-साल
ऐसा लगता है गिरह अब के बरस टूटती है
इफ़्तिख़ार आरिफ़

नया साल दीवार पर टाँग दे
पुराने बरस का कैलेंडर गिरा
मोहम्मद अल्वी

एक लम्हा लौट कर आया नहीं
ये बरस भी राएगाँ रुख़्सत हुआ
इनाम नदीम

इक पल का क़ुर्ब एक बरस का फिर इंतिज़ार
आई है जनवरी तो दिसम्बर चला गया
रुख़्सार नाज़िमाबादी

गुज़िश्ता साल कोई मस्लहत रही होगी
गुज़िश्ता साल के सुख अब के साल दे मौला
लियाक़त अली आसिम

इस गए साल बड़े ज़ुल्म हुए हैं मुझ पर
ऐ नए साल मसीहा की तरह मिल मुझ से
सरफ़राज़ नवाज़

साल गुज़र जाता है सारा
और कैलन्डर रह जाता है
सरफ़राज़ ज़ाहिद

करने को कुछ नहीं है नए साल में ‘यशब’
क्यों ना किसी से तर्क-ए-मोहब्बत ही कीजिए
यशब तमन्ना

न कोई रंज का लम्हा किसी के पास आए
ख़ुदा करे कि नया साल सब को रास आए


[कुछ वर्तनी की कमियों के लिए माफ़ी माँगते हुए]

आभार: रेख़ता

आगे पढ़ें: मेरे मनपसंद शायर और कवि



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